W. Thehra safar... *

नज़दीकियों और फासलों  के दर्मियां, 
कहीं गुम एक लमहा , 
भीड़ में अब भी जो  कभी कभी , 
करता हैं हमको तनहा...

साथ भी और साथ नहीं, 
इस खामोशी  की कोई आवाज नहीं, 
बातें कितनी पर मतलब कुछ भी नहीं, 
कदम बढ़ते हुये  पर मंज़िल का पता नहीं...

टूटा हुआ पर अब भी मुक्कम्मल, 
दबी हुई ख्वाहिशों में  लिपटा , 
बिनाम  सा रिश्ता , ठेहरा सा सफर , 
और हर दिन वही एक मनज़र ...

मेधावी 



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