🎈|शेर (4)|
परछाईयों की परछाईयों से बातें हम कर रहे थे, अंगड़ाइयों को बाहों के पैमानों में, क़ैद हम कर रहे थे, रैना गुज़र गयी यूँ ही आँखों में खो कर, ना जाने कब तेरे हुए हम इतने पराए हो कर. 02.05.15 वो खुली नज़र का ख्वाब है, या किसी गाज़ल सा ख़याल है, नाम में उसके है कायानात सी क्यूँ, अब देखे नज़र उसमें ही सब कुछ क्यूँ. 07.05.15 उसने कहा ठहरो वहीं, ना करना गुस्ताख़ी कुछ मोहब्बत सी, और हम बिखरे ज़र्रों से कायानात लिख आए. 09.05.15 रंग गये मेरे समंदर वो दो पल, बूँद-बूँद बरसे अनगिनत कुछ यूँ मुझ पर, कुछ गर्म साँसें, और नर्म आहटें, दस्तक देती रही जैसे, पूरी रैना मेरी दहलीज़ पर. 18.05.15