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Showing posts from August 18, 2015

Long. वो लम्हा तेरा मेरा अब भी वहीं क़ैद है

जो बद्रा कल रात गुज़र रहे थे, उनमें कुछ बूँदें, अब भी उस शाम की शामिल थी, जब ढलते दिन के साथ, कई ख्वाब मुककममल हो रहे थे. तुमने कलाई मेरी पकड़ ली थी, और बारिश की बूँदें हाथों से, वक़्त की तरह फिसल रही थी, आधे भीगे, आधे सूखे से हम, साथ चल रहे थे यूँ ही. वो बातें जो बेखुदी में डूबी हुई थी, वो बातें जो कुछ तेरी कुछ मेरी थी, वो बातें जो ख़त्म कभी हो ना सकी, उस शाम और रात के दरमियाँ कहीं, अपना वजूद हर ज़र्रे पर लिख गयी. शाम हल्के हल्के ढल रही थी, रात की करीबी बढ़ रही थी, हक़ीक़तें और तकदर्रों के काफिलों से, ज़िंदगी की लौ पिघल रही थी, उस रात में शामिल हमारी मौजूदगी, धीरे धीरे रंग बदल रही थी. गुज़र गयी वो शाम, वो रात, फिर भी कुछ बूँदें अब भी बाकी हैं, जो लम्हा कहीं सिंटा हुआ है उन राहों पर, उसका वजूद अब भी उन फ़िज़ाओं में बाकी है, कुछ ढलती रोशनी, कुछ गुज़रता वक़्त, कुछ हवा, और कुछ बूँदों की सरहद, अब भी शायद बद्रा में क़ैद है, जो गुज़रा नहीं शायद अब तक, वो लम्हा तेरा मेरा अब भी वहीं क़ैद है. मेधावी 17.08.15