🤗|उस सुबह में जैसे हर ख्वाब का काफिला था|
खुद को खोने और पाने में तिल भर का फासला था,
मेरे तेरे दरमियाँ एक काँच की दीवार सा फासला था,
फिसल रहे थे लम्हे, गुज़र रही थी रैना,
बढ़ रही थी धड़कन, बिखर रहे थे अरमान,
समेटे हुए ज़र्रे खुद ही के, वो मुझमें समा रहा था,
मुद्दत से थमा हुआ वक़्त, उस पल गुज़र रहा था,
उसने छुआ था मुझको जब, हर ख़याल थरथराया था,
मेरी ज़ुबान पर आ कर भी, हर लफ्ज़ ठहेर गया था,
हर एक ख्वाब जैसे आँखों के आगे चल रहा था,
कुछ इस तरह उस रात का समा बदल रहा था,
हुई जो सहेर तो वो ख्वाब बाहों में ही पाया,
उसकी उंगलियों से होकर रोशन हुआ ज़ुल्फोन का साया,
जब आँखें बाँध की तो वो ख्वाब वैसा ही जमा था,
उस सुबह में जैसे हर ख्वाब का काफिला था.
Comments
Post a Comment