🤗|कहीं अधूरा है वो भी|
जब निगाह में इंतज़ार हो, पर उम्मीद नहीं,
जब कहने को सब हासिल हो, पर ठीक नहीं,
जब रातों में नींदें हो, पर करार नहीं,
जब रिश्ते में नाम हो, पर प्यार नहीं,
जब सन्नातों में खामोशी हो, पर शांति नहीं,
जब ख्वाबों में एक शक्स हो, पर मंज़िल नहीं,
जब उलफत में इबादत हो, पर हक़ीकत नहीं,
जब हवा में खुश्बू हो, पर एहसास नहीं,
जब दोस्ती में साथ हो, पर विश्वास नहीं,
जब गुज़रे कल में दर्द हो, पर खट्टास नहीं,
और मोहब्बत की एक दास्तान हो, पर जज़्बात नहीं,
तो सोचना यूँ ही, की सब हासिल कर भी, यह ख़ालीपन है क्यूँ,
है ज़िंदगी फिर भी, है अधमरा यह जिस्म क्यूँ,
क्यूँ अब छूने पर किसी के, ज़हेन तक आवाज़ नहीं पहुँचती,
क्यूँ अब मोहब्बत से जुड़ी, कोई बात दिल से नहीं छिड़ती,
क्यूँ अब बस रह गया है बन के यह एक लफ्ज़, मेरी शायरी में,
क्यूँ अब गुफ्तगू खुद से करने से घबराता है दिल,
क्यूँ अब सिमट के रह गया है हर ज़ररा खुद ही में,
क्यूँ हर पल ख़यालों के सैलाब में समाती है हर मंज़िल,
वो मेरी तक़दीर में नहीं, बस एक वक़्त से टूटा हुआ लम्हा है,
मैं हूँ अगर अधूरी, तो कहीं वो भी तन्हा है,
मौजूदगियों में खुद की वो भी है अफ़सोस से घिरा हुआ,
उसको भी सताता है हर दिन वक़्त यह गुज़रा हुआ,
जब ज़िंदगी में साँसें ही हो, पर वजह नहीं,
तो समझ लेना तुम जैसा, कहीं अधूरा है वो भी.
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