कुछ कह रही तही हवा and more


कुछ कह रही तही हवा
शायद तेरा ही नाम था
वरना मेरे पलों में
रौनक यूँ ना आती.

शिकस्त कहूँ इससे अपनी,या जीत तेरी
मुझे खो तूने सब पा लिया
हमारे ख्वाब कब तेरे-मेरे हो गये
इन राहों में चलते चलते,पता ना चला.

|मेरे ख्वाबों को रौंध वो
अपने सपनो का महल बनाने निकल गये
फिर भी ना जाने दुआ ही आती है क्यूँ
तू जो चाहे तुझे हासिल हो कर रहे.|

हर किससे का कोई अंत होता है
हर राह की कोई होती है मंज़िल
रूह बिखरने लगती है मगर
जब टूट ता है दिल,
अश्क़ जब आँख में थमे रह जाते हैं,
बेरूख़ी की बात मुस्कुरा क कह जाते हैं,
इश्क़ की दास्तान ही ऐसी है,
पाक हो कर भी अफ़साने अधूरे रह जाते हैं.

|ल़हेर का क्या है
छू कर वो किनारा
दरिया में लौट जाएगी.
पर किनारे का क्या
जो ल़हेर की बूँदों को
धूप से सूखने ना देगा.|

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