🤗|ना जाने क्यूँ ख़ामखा ही|
Khaamakha...
ना जाने क्यूँ ख़ामखा ही रास्तों पर टिक-ती है नज़र,
गुज़र गया है कब का वो मोहब्बत का मंज़र,
बे-अदब यह ख़याल फिर भी क्यूँ तेरी ओर ले जाते हैं,
लम्हा तोड़ तोड़ हम बार बार इसे समझाते हैं,
है बे-सबर यह तन्हाई, और बे खबर तू मेरे दर्द से,
हैं बिखरी हुई सौगातें गुज़रे कल की,
और टूटी हुई कुछ बेशर्म उम्मीदें,
फिर भी ख़ामखा क्यूँ एक ख्वाब लिए बैठे हैं,
तुम कर चुके 'ना' कब का और हम 'हां' जवाब सुनने बैठे हैं.
गुज़र गया है कब का वो मोहब्बत का मंज़र,
बे-अदब यह ख़याल फिर भी क्यूँ तेरी ओर ले जाते हैं,
लम्हा तोड़ तोड़ हम बार बार इसे समझाते हैं,
है बे-सबर यह तन्हाई, और बे खबर तू मेरे दर्द से,
हैं बिखरी हुई सौगातें गुज़रे कल की,
और टूटी हुई कुछ बेशर्म उम्मीदें,
फिर भी ख़ामखा क्यूँ एक ख्वाब लिए बैठे हैं,
तुम कर चुके 'ना' कब का और हम 'हां' जवाब सुनने बैठे हैं.
Medhavi
16-01-17
16-01-17
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