🤗|अजनबी हो गये हम कब|
अजनबी हो गये हम कब,
यह दूरियाँ कब आ गयीं,
यूँ सामने से गुज़र गये,
जैसे हम को जानते ही नहीं,
जला दी तस्वीरें खत सभी,
हटा दिए कमरे से अपने तोहफे मेरे,
सोचा होता बस एक बार ही सही,
उनमें शामिल थे जज़्बात कितने मेरे,
आज फिर तुम्हे देख राह बदल ली,
खुद पर हँसे भी और ताज्जुब भी हुआ,
बदल गया वक़्त और सब चीज़ें इतनी,
की अब लगता है सब एक ख्वाब ही था.
यह दूरियाँ कब आ गयीं,
यूँ सामने से गुज़र गये,
जैसे हम को जानते ही नहीं,
जला दी तस्वीरें खत सभी,
हटा दिए कमरे से अपने तोहफे मेरे,
सोचा होता बस एक बार ही सही,
उनमें शामिल थे जज़्बात कितने मेरे,
आज फिर तुम्हे देख राह बदल ली,
खुद पर हँसे भी और ताज्जुब भी हुआ,
बदल गया वक़्त और सब चीज़ें इतनी,
की अब लगता है सब एक ख्वाब ही था.
Medhavi
Comments
Post a Comment