🎈|वो सुबह फिर से आ गयी|
मुलाक़ात वो पहली ना थी,
पर अंदाज़ कुछ नए से थे,
लफ़्ज़ों का खेल कुछ नया सा था,
और साथ चलने का एहसास अनकहा सा था.
ख्वाबों के झरोन्कों से निकल,
वो सुबह फिर से आ गयी,
कोई सरहद ना थी जिसकी,
ऐसी रोशनी सी दिल पर छा गयी.
बातें अधूरी रह गयी,
काफिला आगे बढ़ गया,
यूँ ही चलते चलते देखा,
और समा यूँ ही बदल गया.
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