🤗|काफिलों में बँधी वो रात थी|
काफिलों में बँधी वो रात थी,
ना जाने काब्से ख्वाबों में क़ैद एक मुलाक़ात थी,
पल पल बढ़ती नज़दीकी, कितनी बातें अनकही सी,
खुश्बू रागों में उतरती रही, बात कुछ आगे बढ़ती रही,
कुछ अधूरे कुछ मुककममल, लफ़्ज़ों की आग सुलगती रही,
कुछ शून्या कुछ अनगिनत से, एहसास अन-छुए से,
कायानात में बिखरे हुए, ज़र्रे कुछ तेरे मेरे,
उस रात कुछ यूँ मिल गये, की सारी उलझने सिमट गयी
फासलों की इंतेहाँ यूँ ही, लम्हों की दस्तक पे घट गयी.
Excellent!
ReplyDeleteThank you Aunty :-)
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