🤗|फ़ासले|
मैं फ़ासले मिटा रही थी,
वो रंजिशें बढ़ा रहा था,
मैं दरमियाँ ला रही थी बातें,
वो ख़त्म कर रहा था मुलाक़ातें,
मैं याद दिला रही तही गुज़रे अफ़साने,
वो बना रहा था दूर जाने के बहाने,
फिर दिल को समझाना पड़ा हमको ही की कसूर अपना था,
धूप में छाँव का ख्वाब देख रही थी,
सेहरा में बहार को आस दे रही थी,
कदम साथ ना तहे जिसके उससे हमसफ़र कह रही थी,
जिसके लिए मैं कुछ ना तही उससी से मोहब्बत कर रही थी,
मेधावी
5.12.14
Comments
Post a Comment